बाज़ारों और उनकी जन्मभूमि के बारे में

बाज़ार की बात चलते ही बहुतों को तुर्की याद आता है, जो सचमुच अपने बाज़ारों के लिए मशहूर है। लेकिन बाज़ार की असली जन्मभूमि फ़ारस (आज का ईरान) है। «बाज़ार» शब्द फ़ारसी मूल का है (بازار, «bāzār»), और शुरुआत में इसका अर्थ था मंडी या व्यापार का चौक।

फ़ारस के भारत, मध्य-पूर्व और यूरोप के साथ गहरे व्यापारिक रिश्तों की बदौलत यह शब्द दूसरी भाषाओं में फैल गया। आज यह शब्द दुनिया भर में उन बाज़ारों के लिए इस्तेमाल होता है जिनमें पूरब का ख़ास रंग झलकता है।

यहाँ बाज़ार नक़्शे पर एक बिंदु नहीं, बल्कि शहर का ढाँचा है: गलियाँ उसके भीतर से गुज़रती हैं, मस्जिदें और हम्माम उसके अंदर खड़े हैं, और सदियों से सारी ज़िंदगी उसी के इर्द-गिर्द घूमती आई है। वैसे, पूर्वी बाज़ारों को लेकर बनी धारणा के उलट, फ़ारसी बाज़ारों में हैरतअंगेज़ रूप से अच्छी ख़ुशबू आती है। आराम से बैठिए: हम छह बाज़ारों की उलटी गिनती करेंगे — सबसे मशहूर से लेकर सबसे कम आँके गए तक।

6. तेहरान का ग्रैंड बाज़ार

तेहरान का ग्रैंड बाज़ार — मेहराबों के नीचे ढकी हुई दुकानों की कतारें

तेहरान शहर खुद एक विशाल बाज़ार जैसा लगता है। केंद्र में टहलते हुए आपको दुकानों की पूरी-पूरी कतारें मिलेंगी जो एक ही तरह का सामान बेचती हैं। भीड़ और मोटरसाइकिलों की अंतहीन आवाजाही के कारण वहाँ घूमना थका देने वाला हो सकता है। दुकानों का घनत्व दंग कर देता है।

इन व्यापारिक गलियों का सिरा कहाँ है और अंत कहाँ, कहना मुश्किल है — सब कुछ शहर में घुल-मिल जाता है। बाज़ार की सही लंबाई कोई नहीं जानता: अनुमानों के मुताबिक़ उसकी क़तारें दसियों किलोमीटर तक फैली हैं।

तेहरान का ग्रैंड बाज़ार — गलियारे में दुकानें और ख़रीदार

शहर के बीचोबीच, गुलिस्तान महल के पास, एक ढका हुआ इलाक़ा छिपा है जिसे «ग्रैंड बाज़ार» कहते हैं। वह मेहराबदार छतों और नक़्क़ाशीदार तोरणों से आपका स्वागत करता है। आम पर्यटक स्मृति-चिह्न यहाँ कम ही मिलते हैं, पर उबलती हुई ज़िंदगी का माहौल जी भर के मिलता है। बाज़ार में संगीत समारोह, त्योहार और नाट्य प्रदर्शन भी होते हैं।

बीते ज़माने में तेहरान का बाज़ार व्यापारियों और धार्मिक नेताओं की सभाओं और बहसों की जगह था — आयतुल्लाह ख़ुमैनी जैसे नेताओं ने जनता के असंतोष को आवाज़ देने के लिए बाज़ार का ही सहारा लिया, जो आगे चलकर इस्लामी क्रांति में बदला।

तेहरान के ग्रैंड बाज़ार की क़तारों में सामान

यह बाज़ार रूसी-ईरानी संबंधों के सबसे स्याह पन्ने से भी जुड़ा है। जनवरी 1829 में — 1826–1828 के रूस-फ़ारस युद्ध की समाप्ति के एक साल बाद — तुर्कमानचाय संधि की शर्तों से भड़की भीड़ यहाँ जमा हुई। वह रूसी दूतावास की ओर बढ़ी, जहाँ क़त्लेआम हुआ। मारे गए लोगों में अलेक्सांद्र ग्रिबोयेदोव भी थे — राजनयिक, प्राच्यविद और रूसी क्लासिक नाटक «बुद्धि से शोक» के लेखक।

5. शीराज़ का वकील बाज़ार

शीराज़ का वकील बाज़ार — ईंटों की मेहराबदार गैलरियाँ

शीराज़ किस बात के लिए मशहूर है? कुछ लोगों को इसी नाम की वाइन याद आएगी — सुंदर किंवदंती, पर बस इतनी ही: आनुवंशिकीविदों ने कब का साबित कर दिया कि सीरा अंगूर फ़्रांस की रोन घाटी से आया है, और शीराज़ से उसे बस नामों की समानता जोड़ती है; वैसे भी ईरान में आपको वाइन कोई नहीं परोसेगा — यहाँ शराबबंदी है। कुछ लोगों को रूसी कवि सर्गेई येसेनिन की «फ़ारसी धुनें» याद आएँगी, और यहाँ विडंबना और भी महीन है: येसेनिन ने फ़ारस की धरती पर कभी क़दम नहीं रखा — पूरा काव्य-चक्र उन्होंने कल्पना से रचा, 14वीं सदी के शीराज़ी कवि हाफ़िज़ से प्रेरित होकर, जिन्होंने अपने शहर के गुलाबों और बाग़ों के गीत गाए थे। यानी वाइन हो या फ़ारस पर लिखी रूसी कविता — दोनों शीराज़ की गूँज भर हैं।

शीराज़ के वकील बाज़ार की दुकानों की कतारें

वकील बाज़ार खुद शहर की शोहरत से जवान है: वह 18वीं सदी में बना, जब करीम ख़ान ज़ंद ने शीराज़ को अपनी राजधानी बनाया और उसे इस्फ़हान के जोड़ का बनाने की ठानी — क़िला, मस्जिद, हम्माम और बाज़ार एक ही परिसर के रूप में खड़े हुए। नाम शासक की उपाधि से आया है: करीम ख़ान ने शाह की उपाधि ठुकरा दी और खुद को «वकील-उर-रआया» — «जनता का प्रतिनिधि» — कहलवाया।

शीराज़ के वकील बाज़ार के गलियारे की ईंट की मेहराबें

वकील की मुख्य गली ऊँची ईंट की मेहराबों तले एक चौड़ा गलियारा है, जहाँ भरी गर्मी में भी ठंडक रहती है। उससे टेढ़ी-मेढ़ी बग़ली गलियाँ फूटती हैं, और असली बाज़ार वहीं खुलता है: शांत आँगनों वाली भीतरी सरायें, पुरानी चीज़ों की दुकानें, शीराज़ी पारंपरिक खाने वाले आरामदेह कैफ़े। «लूबिया पोलो» — फलियों वाला पुलाव — ख़ास तवज्जो का हक़दार है, और मिठाई में लीजिए «मसग़ाती» — गुलाबजल, स्टार्च और केसर से बनी पारभासी मिठाई।

शीराज़ के वकील बाज़ार में सामान के ठेले

यहीं, दुकानों से दो क़दम पर, पारंपरिक हम्माम का संग्रहालय है — वकील हम्माम, जिसे उसी करीम ख़ान ने बनवाया था। बाज़ार की भीड़भाड़ में बस एक बात याद रखने लायक़ है — जेबकतरे: बड़े बाज़ार उन्हें मुसाफ़िरों से कम प्यारे नहीं।

4. इस्फ़हान का बाज़ार

इस्फ़हान का ग्रैंड बाज़ार — ढकी हुई दुकानों की कतारें

इस्फ़हान के बारे में फ़ारसी कहते हैं: «इस्फ़हान आधी दुनिया है»। यह आत्मविश्वास कहाँ से आया, समझने के लिए दूर से शुरू करते हैं। अगर आप बुख़ारा, समरक़ंद या तुर्किस्तान गए हों, तो आपने चमकीली टाइलों से मढ़ी नीली मस्जिदें देखी होंगी — तथाकथित तैमूरी वास्तुकला। उसका बड़ा हिस्सा इस्फ़हानी कारीगरों का काम है: फ़ारसी ज़मीनें जीतने के बाद तैमूर ने बेहतरीन उस्ताद इकट्ठे किए और उन्हें अपने पूरे साम्राज्य में महल बनाने ले गया।

इस्फ़हान के ग्रैंड बाज़ार की मेहराबों तले दुकानें

समय के साथ तैमूर का साम्राज्य ढह गया और पीछे अनगिनत इमारतें छोड़ गया। बाद में उसकी जीती हुई ईरानी ज़मीन पर एक नया राज्य उभरा — सफ़वी फ़ारस, जिसकी राजधानी इस्फ़हान बनी। तैमूरी वास्तुकला से प्रेरित शाह अब्बास प्रथम ने अपनी राजधानी को कला और संस्कृति का केंद्र बनाने की ठानी। यूँ बना नक़्श-ए-जहाँ चौक («दुनिया की तस्वीर») — धरती के सबसे बड़े चौकों में से एक और यूनेस्को की विश्व धरोहर। आधी दुनिया वाली कहावत ठीक उसी दौर में जन्मी: अब्बास के राज में यह शहर सचमुच खुद को ब्रह्मांड का केंद्र महसूस करता था।

इस्फ़हान का बाज़ार बाज़ार जैसा लगता ही नहीं — वह महल परिसर का हिस्सा है। पश्चिम से चौक पर अली क़ापू महल की नज़र है — शाही निवास का भव्य द्वार; चौक खुद दो मंज़िला व्यापारिक तोरण-पंक्तियों से घिरा है; और उत्तर में क़ैसरिये दरवाज़े के पार बाज़ार की ढकी सड़क शुरू होती है — शहर की गहराई में दो किलोमीटर, पुरानी जामा मस्जिद तक।

तेहरान के उलट यहाँ का माहौल शांत और ठहरा हुआ है: बिकते हैं क़ालीन, स्मृति-चिह्न, चित्र, संदूकचे, प्राचीन वस्तुएँ और बहुत कुछ। बहुत-सी चीज़ें आगंतुकों की आँखों के सामने ही बनती हैं। इन क़तारों का पहचान-रंग फ़िरोज़ी है: यह मीनाकारी है, चित्रित मीनाकारी। नीली तश्तरियाँ वहीं काउंटर के पीछे रँगी जाती हैं — उस्ताद महीन क़लम से नक़्श उकेरता है, और आप जितनी देर चाहें देख सकते हैं।

3. तबरेज़ का ग्रैंड बाज़ार

तबरेज़ का ग्रैंड बाज़ार — ईंट के गुंबदों तले ऐतिहासिक क़तारें

अगर तबरेज़ के बाज़ार की कोई अतिथि-पुस्तिका होती, तो वह महान यात्राओं के इतिहास-सी पढ़ी जाती। मार्को पोलो ने तबरेज़ को उन फलते-फूलते व्यापार केंद्रों में गिना जहाँ रेशम और कपड़ों के लिए भारत और चीन के सौदागर उमड़ते थे। इब्न बतूता यहाँ की सरायों के जाल पर चकित हुए, जिसने शहर को रेशम मार्ग की सबसे व्यस्त गाँठों में बदल दिया था। भारत से लौटते हुए रूसी व्यापारी अफ़ानासी निकितिन ने भी यहाँ अपने निशान छोड़े।

तबरेज़ के ग्रैंड बाज़ार के ईंट के गुंबद और गैलरियाँ

वजह सीधी है: शहर तीन बड़े व्यापार मार्गों के चौराहे पर खड़ा है, और बाज़ार उसी चौराहे से खुद-ब-खुद उग आया — इतना पहले कि सही तारीख़ कोई नहीं बता सकता। यात्रियों के प्रशंसा-भरे वर्णन 13वीं सदी से ही मिलने लगते हैं।

बाज़ार का स्वर्णकाल 16वीं सदी में आया, जब तबरेज़ सफ़वियों की पहली राजधानी था — फिर दरबार क़ज़्वीन चला गया, और वहाँ से इस्फ़हान। आज का ईंट वाला चेहरा 1780 के विनाशकारी भूकंप के बाद नए सिरे से हुए निर्माण की देन है।

तबरेज़ के ग्रैंड बाज़ार की क़तारें और दुकानें

आज तबरेज़ का बाज़ार यूनेस्को की विश्व धरोहर है और दुनिया का सबसे बड़ा ढका बाज़ार माना जाता है। उसकी मुख्य मुद्रा है क़ालीन: सबसे उम्दा फ़ारसी क़ालीन यहीं बुने जाते हैं, और बाक़ी सब कुछ उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है — मिठाइयों और सूखे मेवों के ढेर, जौहरियों की दुकानें, चायख़ाने। और बड़े मौक़ों पर व्यापार पीछे हट जाता है: तबरेज़ के लिए बाज़ार आज भी वह जगह है जहाँ पूरा शहर एक साथ जुटता है — त्योहारों पर भी, मातम में भी।

2. काशान का बाज़ार

काशान का बाज़ार — ढकी हुई दुकानों की कतारें

काशान दश्त-ए-कवीर रेगिस्तान के किनारे बसा व्यापारियों का नख़लिस्तान-शहर है। हज़ारों साल से यहाँ काफ़िले ठहरते आए; व्यापारी धनी होते गए और महलों-जैसी हवेलियाँ खड़ी करते गए — और बाज़ार उस ज़िंदगी का दिल था, और आज भी है। अब उसकी पुरानी सरायों में चायख़ाने, कार्यशालाएँ और छोटे होटल चलते हैं, और यूँ दुकानों की क़तारें चुपचाप शहर में घुल जाती हैं, और शहर बाज़ार में।

ख़ास तौर पर 19वीं सदी में बना अमीन-उद-दौला गुंबद ध्यान खींचता है, जिसे फ़ारसी वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति यों ही नहीं माना जाता। दोपहर को आइए, जब सूरज गुंबद के झरोखे से रोशनी के स्तंभ बनकर उतरता है और उनमें धूल नाचती है — सफ़र की सबसे अच्छी तस्वीर की लगभग गारंटी है।

काशान के बाज़ार की मेहराबें और गैलरियाँ

बाज़ार में मिलेंगे मिट्टी के बर्तन, कपड़े, गुलाबजल और हस्तशिल्प। स्थानीय चायख़ानों में जाकर हलवे के साथ पारंपरिक चाय चखना न भूलिए।

काशान के बाज़ार की दुकानें और सामान

गुलाबजल से बने पेय ज़रूर आज़माइए और स्थानीय कारीगरों के काम पर नज़र डालिए। मसलन, काशान की मिट्टी की चीज़ें बेजोड़ हैं। टालने की ग़लती मत कीजिए: कुछ पसंद आए तो फ़ौरन ख़रीद लीजिए — दूसरे शहरों का माल आपको निराश कर सकता है।

1. क़ज़्वीन का बाज़ार

क़ज़्वीन का बाज़ार — ढकी हुई दुकानों की कतारें

क़ज़्वीन ऐसा शहर है जो पर्यटन मार्गों में कम ही आता है — और यह सरासर नाइंसाफ़ी है। 16वीं सदी में यह सफ़वी फ़ारस की राजधानी था — इससे पहले कि शाह अब्बास दरबार को इस्फ़हान ले गए। राजधानी वाले दौर की विरासत में शहर को एक शानदार बाज़ार मिला, जो तब से बढ़ता ही गया।

कल्पना कीजिए — दसियों हेक्टेयर ढकी गलियाँ। नक़्शा लगभग शतरंज की बिसात है: गलियारे मस्जिदों, तीमचों (व्यापार-मंडपों) और खुले भीतरी आँगनों को जोड़ते हैं। ईंट की मेहराबों के रोशनदानों से रोशनी छनती है, और दीवारों पर काशीकारी झिलमिलाती है — पारंपरिक नक़्शों वाली चमकीली टाइलें।

क़ज़्वीन के बाज़ार की गैलरियाँ और दुकानें

इस भूलभुलैया की सबसे बड़ी खोज है सअद-उस-सल्तने परिसर। वह आम मंडी के तौर पर नहीं, बल्कि ईरान की सबसे बड़ी ढकी शहरी सराय के तौर पर बना था: 19वीं सदी के आख़िर में, क़ाजार दौर में, तेहरान से रूस और यूरोप के रास्ते पर कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए एक ताक़तवर व्यापार-रसद केंद्र के रूप में। आज उसे बड़े जतन से बहाल कर गैलरियों और शिल्प-दुकानों वाला सांस्कृतिक केंद्र बना दिया गया है। वहाँ चाय लेकर बैठना और क़ाजार दौर की नफ़ीस मेहराबें निहारना अपने आप में एक सुख है। सफ़वियों की रूह चाहिए तो क़ैसरिये जाइए — बाज़ार का सबसे पुराना हिस्सा: ऊँची ईंट की मेहराबें और यह एहसास कि पिछले चार सौ बरसों में यहाँ शायद ही कुछ बदला हो।

क़ज़्वीन के बाज़ार की क़तारों में सामान

क़ज़्वीन की सबसे बड़ी ख़ूबी: यहाँ भीड़-भाड़ वाला पर्यटन लगभग नहीं है। यह न इस्फ़हान है, न शीराज़। यहाँ आप चलता-फिरता बटुआ नहीं, मेहमान हैं — और फ़र्क़ फ़ौरन महसूस होता है।


छह शहर — इस सवाल के छह जवाब कि फ़ारसी बाज़ार क्या है। तेहरान में उसने क्रांति की; शीराज़ में कवियों को प्रेरणा दी; इस्फ़हान में वह महल का विस्तार था; तबरेज़ में — रेशम मार्ग की गाँठ; काशान में — कारख़ाना; क़ज़्वीन में — यूरोप के आधे रास्ते की सराय। यहाँ बाज़ार शहर से सटा हुआ कोई बाज़ार नहीं, बल्कि वह दिल है जिसके गिर्द शहर बड़ा हुआ: इन मेहराबों तले सदियों से सौदे होते रहे, शेर कहे जाते रहे, काफ़िलों की अगवानी होती रही और युग विदा होते रहे।

ज़ाहिर है, ईरान इन छह पर ख़त्म नहीं होता: करमान, क़ुम और यज़्द के अपने बाज़ार हैं, और हर एक अलग दास्तान का हक़दार है। लेकिन पहली मुलाक़ात के लिए ये छह काफ़ी से ज़्यादा हैं। और सबसे अहम नियम अब आप जानते हैं: ईरानी बाज़ार में मोल-भाव करना मर्ज़ी है — चाय पीना फ़र्ज़।